वो रोज़ मुजरिम ठहराती है मुझे

वो रोज़ मुजरिम ठहराती है मुझे अपने दिल के चोरी का
                        
और उन से सज़ा माँगो तो मुस्कुरा कर बाँहों में समेट लेटे है..

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ